March 17, 2026

गांव का मोर बना सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र

कोरबा 12 सितंबर। भटक कर गांव में आ गया मोर अब ग्रामीणों के बीच ही एक सदस्य की तरह घुल मिल गया है। गांव की गलियों से लेकर घर व दुकानों में फुदकता रहता है। इसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। जंगल में सैर करने निकले सैलानियों के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पक्षी व ग्रामीणों के बीच के दोस्ती किसी मिसाल से कम नहीं।

राष्ट्रीय पक्षी मोर आमतौर पर जंगल या चिडिय़ाघरों में देखने को मिलता है, पर जिले के सुदूर वनांचल ग्राम लेमरू में जंगल से भटककर आए एक मोर ने आबादी के बीच ही अपना बसेरा बना लिया है। घरों की मुंडेर और गलियों में बेरोकटोक घूमता है, वह ग्रामीणों के लिए उनका दोस्त व परिवार के सदस्य की तरह बन गया है। जिला मुख्यालय से करीब 52 किलोमीटर दूर स्थित लेमरू गांव है। पहाड़ी और घने जंगल से घिरे लेमरू गांव की खूबसूरती को राष्ट्रीय पक्षी मोर ने बढ़ा दिया है। करीब सात साल पहले घने जंगल से भटक यह मोर रिहायशी इलाके में पहुंच गया था, उस वक्त काफी छोटा था। ग्रामीणों ने इसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि इसके दाना-पानी की व्यवस्था कर दी। लोगों के इस व्यवहार को देखकर मोर गांव में रुक गया। तब से ये खूबसूरत मोर गांव की शोभा बढ़ा रहा है।

यह मोर गांव की गलियों में इत्मीनान से घूमता है जब भूख लगती है तो गांव के बीच स्थित होटल पहुंच जाता है। होटल व्यवसाई भी इसके इशारे को समझ जाते है। भर पेट दाना चुगने के बाद मोर गांव की सैर पर निकल जाता है। सुबह व शाम के वक्त गांव के चौराहे पर जब अपने पंख को फैलाकर झूमता है उस दौरान इसे देखने के लिए भीड़ लग जाती है। इस मोर की मौजूदगी के कारण लेमरू काफी चर्चित है और आने-जाने वाले राहगीरों के साथ पर्यटक भी उसे देखने ठिठक जाते हैं। इस खूबसूरत मोर को करीब से देखने के लिए दूर से लोग आते है। गांव के लोग इसका पूरा ख्याल रखते है। अब यह मोर ग्रामीणों के परिवार की सदस्य की तरह रहता है। वन विभाग द्वारा भी राष्ट्रीय पक्षी मोर की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है।

वनभ्रमण या पर्यटन के शौकीनों को घने जंगल में पहुंचते ही अब तक मयूर की केवल आवाजें ही सुनाई देती थी। अब एक मोर खुद उनके पास चला आता है। सुदूर वनांचल ग्राम लेमरू में एक दिन जंगल से भटककर आए मोर को ग्रामीणों ने दी शरण। अब वह गांव में स्वतंत्र एवं बिना किसी डर यहां-वहां घूमता रहता है। इतना ही नहीं, पर्यटकों के ठिठकर रुक जाने पर उनके पास चला आता है। होटल हो या किसी ग्रामीण का घर, भूख लगते ही उनके पास चला आता है और वे उसे निस्वार्थ भाव से अपने परिवार का सदस्य मान उसे भरपेट चारा भी खिलाते हैं।

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Ranjan Prasad

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