करोड़ की पीएम आवास योजना अधर में, मकान आधे दशक बाद भी खाली

कोरबा। गरीबों के लिए पक्का मकान उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना नगर पालिक निगम कोरबा में अधूरी साबित हो रही है। दादर क्षेत्र में 130 करोड़ की लागत से बनाए गए 2784 पीएम आवासों में से अधिकांश आज भी खाली पड़े हैं। पाँच–छह स्लम बस्तियों के लोगों को विस्थापित कर सर्वसुविधायुक्त कॉलोनी में बसाने की योजना आधे दशक बाद भी मूर्त रूप नहीं ले सकी है। 2019 में शुरू हुई परियोजना के तहत 56 ब्लॉक में तीन मंजिला इमारतों का निर्माण किया गया था और जुलाई 2022 तक सभी हितग्राहियों को शिफ्ट करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन चिन्हित हितग्राही पुराने मकान छोड़कर यहां आने तैयार नहीं हुए। अब स्थिति यह है कि कई मकान जर्जर होने लगे हैं। जमनीपानी साडा कॉलोनी के मकानों की हालत भी खराब है। यहां खिड़की-दरवाजों की चोरी तक हो रही है। डीएमएफ फंड से नए सिरे से मरम्मत और बाउंड्री वॉल निर्माण कार्य चल रहा है। अधिकारियों के अनुसार, कार्य पूर्ण होने के बाद आवंटन फिर से शुरू किया जाएगा। निगम क्षेत्र में कुल 62 अधिसूचित और 41 अघोषित मलिन बस्तियाँ हैं, जिनमें 46 फीसदी आबादी रहती है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव वाले इन क्षेत्रों के लिए बनाई गई कॉलोनियों में लोग रुचि नहीं ले रहे हैं। कई बार विज्ञापन निकलने के बावजूद मकानों के आवंटन की प्रक्रिया निरस्त पड़ी है। स्लम वासियों के न आने पर सरकार ने नियम बदलकर मोर आवास मोर अधिकार शहरी पीएम आवास योजना 2.0 लागू की है। इसके तहत अब 3 लाख रुपये तक की पारिवारिक आय वाले कोई भी व्यक्ति इन मकानों को खरीद सकता है। फिर भी दादर की विशाल कॉलोनी आज भी लगभग खाली है और करोड़ों की परियोजना अधर में लटकी हुई है।
0 करोड़ों की परियोजना पर संकट
लंबे समय से खाली पड़े मकान अब जर्जरता की ओर बढ़ रहे हैं। कई जगहों पर दीवारें टूटने लगी हैं और अधोसंरचना का रखरखाव भी नहीं हो पा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही लोगों को बसाने के लिए ठोस रणनीति नहीं बनी, तो करोड़ों की यह महत्वाकांक्षी योजना बेकार हो सकती है। स्थानीय नागरिकों की अपेक्षा है कि सरकार और निगम मिलकर स्लम पुनर्वास के लिए व्यवहारिक और प्रभावी समाधान खोजे, ताकि गरीब परिवारों को सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराया जा सके और वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजनाओं को नया जीवन मिल सके।